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ऐसा कौन सा पत्थर है, जो पानी में नहीं डूबता है?

यह सच है – कुछ चट्टानें एक बार में वर्षों तक पानी पर तैर सकती हैं। और अब वैज्ञानिकों को पता है कि वे इसे कैसे करते हैं, और आखिरकार उनके डूबने का क्या कारण होता है।

ऊर्जा विभाग के लॉरेंस बर्कले नेशनल लेबोरेटरी विभाग में एक्स-रे अध्ययन ने वैज्ञानिकों को हल्के, कांचदार और झरझरा ज्वालामुखीय चट्टानों के नमूनों के अंदर स्कैन करके इस रहस्य को सुलझाने में मदद की है, जिन्हें प्यूमिस पत्थरों के रूप में जाना जाता है। एक्स-रे प्रयोग बर्कले लैब के एडवांस्ड लाइट सोर्स (ALS) में किए गए थे, जो एक्स-रे स्रोत को एक सिंक्रोट्रॉन के रूप में जाना जाता है।

इन चट्टानों के आश्चर्यजनक रूप से लंबे समय तक रहने वाले उछाल – जो समुद्र में लंबे-लंबे मलबे पैच बन सकते हैं, जिन्हें प्यूमिस राफ्ट के रूप में जाना जाता है जो हजारों मील की यात्रा कर सकते हैं – वैज्ञानिकों को पानी के नीचे ज्वालामुखी विस्फोट की खोज में मदद कर सकते हैं।

2006 की उपग्रह छवि में, टोंगा द्वीप में ज्वालामुखी विस्फोट के बाद तैरते प्यूमिस पत्थरों (बेज) का एक बड़ा “बेड़ा” दिखाई देता है।

और, इससे परे, इसके प्लवन के बारे में जानने से हमें यह समझने में मदद मिल सकती है कि यह ग्रह के चारों ओर कैसे फैलता है; प्यूमिस पोषक तत्वों से भरपूर होता है और आसानी से पौधे के जीवन और अन्य जीवों के समुंद्री वाहक के रूप में कार्य करता है। फ्लोटिंग प्यूमिस नावों के लिए भी खतरा हो सकता है, क्योंकि ग्राउंड-अप प्यूमिस का ashy मिश्रण इंजनों को रोक सकता है।

“एक अस्थायी बर्कले स्नातक के छात्र क्रिस्टन ई। फौरिया ने अध्ययन का नेतृत्व किया, जो पृथ्वी और ग्रहों के विज्ञान पत्र में प्रकाशित किया गया था।”

प्यूमिस पथरी।

जबकि वैज्ञानिकों ने जाना है कि इसके छिद्रों में गैस की मात्रा के कारण प्यूमिस तैर सकता है, यह अज्ञात था कि लंबे समय तक उन गैसों को प्यूमिस के अंदर कैसे फंसा रहता है। यदि आप एक स्पंज में पर्याप्त पानी सोखते हैं, उदाहरण के लिए, यह डूब जाएगा।

“यह मूल रूप से सोचा गया था कि प्यूमिस के पोरसिटी को अनिवार्य रूप से सील कर दिया गया है,” फारिया ने कहा, समुद्र में तैरने वाली एक कॉर्क की बोतल की तरह। लेकिन प्यूमिस के छिद्र वास्तव में काफी हद तक खुले और जुड़े होते हैं – एक अनारकली बोतल की तरह। “यदि आप टोपी छोड़ देते हैं और यह अभी भी तैरता है … क्या चल रहा है?”

कुछ प्यूमिस पत्थरों को प्रयोगशाला में “बॉब” के लिए भी देखा गया है – शाम के दौरान डूबना और दिन के दौरान सामने आना।

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कौन सी ऐसी झील है, जिसमें जाने वाला पत्थर का बन जाता है?

उस झील नाम हैं नट्रान झी, कहा जाता है कि उस झील में जाने वाले सारे जीव पत्थर बं जाते है।

फोटोग्राफर निक ब्रांड्ट जब उत्तरी तंजानिया की नेट्रान लेक की तटरेखा पर पहुंचे तो वहां के दृश्य ने उन्हें चौंका दिया। झील के किनारे जगह-जगह पशु-पक्षियों के स्टैच्यू नजर आए। वे स्टैच्यू असली मृत पक्षियों के थे। दरअसल झील के पानी में जाने वाले जानवर और पशु-पक्षी कुछ ही देर में कैल्सिफाइड होकर पत्थर बन जाते हैं।

Brandt अपनी नई फोटो बुक ‘Across the Ravaged Land’ में लिखते है की “कोई भी निश्चित रूप से नहीं जानता है की ये कैसे मरे पर लगता है की लेक की अत्यधिक रिफ्लेक्टिव नेचर ने उन्हें दिग्भ्रमित किया फलस्वरूप वे सब पानी में गिर गए। ” वो आगे लिखते है की ” पानी में नमक और सोडा की मात्रा बहुत ही जयादा है, इतनी जयादा की इसने मेरी कोडक फिल्म बॉक्स की स्याही को कुछ ही सेकंड में जमा दिया। पानी में सोडा और नमक की ज्यादा मात्रा इन पक्षियों के मृत शरीर को सुरक्षित रखती है।”

इन पक्षियों के फोटो का संकलन ब्रांड्ट ने अपनी नई किताब ‘Across the Ravaged Land’ में किया है। यह किताब उस फोटोग्राफी डाक्यूमेंट का तीसरा वॉल्यूम है, जिसे निक ने पूर्वी अफ्रीका में जानवरों के गायब होने पर लिखा है।

पानी में अल्कलाइन का स्तर पीएच9 से पीएच 10.5 है, यानी अमोनिया जितना अल्कलाइन। लेक का तापमान भी 60 डिग्री तक पहुंच जाता है। पानी में वह तत्व भी पाया गया जो ज्वालामुखी की राख में होता है। इस तत्व का प्रयोग मिस्रवासी ममियों को सुरक्षित करने के लिए रखते थे।

वो अपनी किताब में आगे लिखते है ” सारे प्राणी calcification के कारण चट्टान की तरह मजबूत हो चुके थे इसलिए बेहतर फोटो लेने के लिए हम उनमे किसी भी तरह का बदलाव नहीं कर सकते थे इसलिए फोटो लेने के लिए हमने उन्हें वैसी ही अवस्था में पेड़ो और चट्टानों पर रख दिया।”

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क्या भारत में ताजमहल से भी अच्छा कुछ है?

जी हां, ताजमहल से सुन्दर कोई महल या मंदिर नहीं देखा होगा। लेकिन आज मैं आपको ताजमहल से भी सुंदर मंदिर दिखाने जा रहा हूं जिसका निर्माण 116 सालो से हो रहा है। इस मंदिर को बनाने में 4 पीढ़ी गुजर गयी है। यह दुनिया का एक मात्र ऐसा मंदिर होगा, जो कई तथ्यों में ताजमहल को भी पीछे छोड रहा है। बताया जा रहा है कि इस मंदिर में अभी तक 400 करोड का खर्चा आ चुका है, लेकिन अभी तक इस का निर्माण पूरा नहीं हुआ। आज मैं आपको बता रहा हूं 116 साल पुराने इस खूबसूरत मंदिर की कहानी।

संत परंपरा में राधा स्वामी मत अपना विशेष स्थान रखता है। आगरा के पन्नी गली में खत्री परिवार में जन्मे शिवदयाल सिंह ने इस राधा स्वामी मत की स्थापना की थी जो बाद में अपने भक्तों के बीच स्वामी जी महाराज के नाम से जाने गए। आगरा के स्वामीबाग में स्वामी जी महाराज की समाधि पर आज एक विशेष, भव्य और अलौकिक मंदिर बनकर तैयार हो गया है, इस मंदिर की नींव 1903 में डाली गई थी।

आगरा के स्वामीबाग स्थित सफेद संगमरमर से बना राधास्वामी मंदिर आज लाखों करोड़ों श्रद्धालओं की आस्था को बहुत बड़ा केंद्र बना हुआ है। बताया जाता है साल 1903 में इस मंदिर की आधार शिला रखी गयी थी और 116 साल बीत जाने के बाद आज भी लगातार इसका निर्माण कार्य हो रहा है।

161 फीट ऊंचे राधास्वामी मंदिर पर 31 फीट ऊंचे कलश की स्थापना की गई है जिस पर करीब 17 किलोग्राम सोने की परत चढ़ाई गयी है।

न्यू आगरा से पोइया घाट जाने वाली रोड पर पड़ने वाला यह मंदिर पूरा सफेद पत्थरों का बना हुआ है। मुख्य द्वार से मंदिर का दृश्य और सुंदर दिख सके इसके लिए प्रवेश द्वार को पूरा लाल पत्थरों से बनाया गया हैै। लाल पत्थरों के बीच से सफेद मंदिर का दृश्य देखने लायक होगा। मंदिर में लगे पत्थरों को हाथों से तराशा जा रहा है। मंदिर में लगा सफेद और गुलाबी रंग का संगमरमर मकराना राजस्थान से मंगवाकर लगाया गया है

राधास्वामी मंदिर के मुख्य एंट्रेंस गेट में पांच द्वार दिए गए है जो कि राधास्वामी नाम में आने वाले 5 अक्षरों के मुताबिक ही रखे। एक मुख्य गेट के बीच में दो दाई तरफ एवं दो बायं तरफ गेट बनाए गए है। बता दे कि राधास्वामी मत से दुनिया भर के लाखों अनुयायी जुड़े है। विशाल भंडारे के समय लाखों की संख्या में सत्संगी आगरा आते है। इस को ध्यान में रखते हुए मंदिर के बीच का द्वार मुख्य द्वार रहेगा। उसके बगल के दोनों द्वार एक एंट्री एवं एक्जिट के लिए होगें। वहीं सबसे अंतिम के दोनों तरफ के द्वार वीवीआईपी एवं दिव्यांगों के लिए रहेंगे।

कहा जाता है कि जब स्वामी जी महाराज के भक्तों की संख्या बढ़ने लगी और उनका पन्नी गली स्थित घर छोटा पड़ने लगा तो उन्होंने अपने आश्रम के लिए एक जगह तलाशना शुरू कर दिया। वसंत पंचमी के दिन साल 1861 में स्वामी जी महाराज ने अपने राधास्वामी मत को शुरू किया और देखते ही देखते जब उनके अनुयायियों की संख्या बढ़ने लगी तो उन्होंने एक मल्लाह से जगह खरीदकर स्वामीबाग आश्रम की स्थापना की जो आज के समय में राधास्वामी मत से जुड़े लोगों का सबसे बड़ा भक्ति का केंद्र है।

15 जून साल 1878 में स्वामी जी महाराज परलोक गमन हुए तो उनके द्वितीय सन्त हुजूर महाराज ने पवित्र रज को प्रतिष्ठापित किया और उनकी स्वामीबाग में ही समाधि बनाई, जहां स्वामी बाग में उन्होंने अंतिम समय बिताया और जहां वह अपने अनुयायियों के साथ सत्संग किया करते थे। साल 1879 में स्वामीबाग में समाधि का निर्माण किया गया जो लाल पत्थरों से बनी हुई थी।

लेकिन बाद में जो स्वामी जी महाराज की समाधि के ऊपर जो निर्माणाधीन भव्य मंदिर देख रहे हैं। उसको राधास्वामी मत के तीसरे संत सतगुरु महाराज साहब के आदेश से बनाया जा रहा है। क्योंकि उनका विचार था कि इस मत का भविष्य में बहुत अधिक विस्तार होने वाला है। ताकि ये जगह उनके माकूल श्रद्धांजलि का केंद्र बने और यहां सत्संगियों के मिलने और अभ्यास का केंद्र बने।

उसके बाद साल 1879 में बनी समाधि को गिराकर आज जो भव्य रूप दुनिया देख रही है उसकी कल्पना की गई। वर्तमान समाधि की रूपरेखा महाराज साहब के निर्देश पर इटैलियन फर्म फ्रिजोनि ने डिजायन की, और इसमें कुछ संशोधन लाला तोताराम ने किये। और आज इस मंदिर का भव्य रूप दुनिया के सामने है। यानी देश में पहली बार लेजर तकनीक से संगमरमर को साफ किया जा रहा है।

इस मंदिर में भारत की धरोहर नक्काशी, पच्चीकारी का अद्भुत कला नजर आती है, जो यहां आने वाला कोई भी व्यक्ति यहां आता है, तो इसकी तारीफ करने के लिए शब्द कम पड़ जाते हैं। राधास्वामी मंदिर में भारत के विभिन्न प्रान्तों और धर्मों के समृध्द सांस्कृतिक विचारों का समावेश बड़ी खूबसूरत तरीके से किया गया है।

161 फीट ऊंचे मंदिर और उस पर लगे 31 फीट ऊंचे कलश को बाहर से देखने पर गगनचुम्भी किसी इमारत का अहसास होता है। भूमि तल पर सत्संग हाल का निर्माण किया गया है जो 68 गुना 68 फीट का है। मंदिर की दीवारों पर संत सतगुरुओं की वाणी तराशी गयी है। स्तम्भों पर गुरु के वचन तराशे गए हैं। फूल पत्तियों की नक्काशी बता रही है कि इस मंदिर के जरिए पर्यवारण के प्रति प्रेम को भी ज़ाहिर किया गया है।

पूरी डिजायनों में पत्थर का काम है। मगर, लोगों को पहली नजर में यहाँ पेंटिंग जैसा नजर आता है। पत्थरों पर रंगीन डिजाइन भरने के लिए पत्थरो में छेद कर आकर्षक पत्थर बने हैं। इस मंदिर का कलश आगरा में सबसे बड़ा एवं चमकदार बताया जा रहा है क्योंकि, यह सोने का बना हुआ है।

दीवारों पर राधास्वामी नाम कई भारतीय भाषाओं में तराशे गए हैं। हाल के केंद्र में स्वामीजी महाराज और उनकी धर्मपत्नी राधा जी महाराज की पवित्र चैतन्य रज स्थापित की गई है। तल के चारों ओर बरामदा है और 52 कुओं पर इस विशालकाय खूबसूरत मंदिर की आधारशिला रखी गयी है। मंदिर के चारों तरफ 20 फुट चौड़ी नहर भी बनाई गई है जिसमें फव्वारे लगे हुए हैं। पूर्व दिशा में स्वामी जी महाराज का पवित्र कुआं है जो बहुत खूबसूरती से मंदिर से ही जोड़ लिया गया है।

इसे बनाने में करीब 7 करोड़ रुपए सालाना खर्च हो रहे हैं। अब तक करीब 400 करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं। इसे बनाने में किसी तरह की सरकारी या गैर सरकारी मदद नहीं ली गई है। सिर्फ राधास्वामी मत के अनुयायी ही अपने पैसे से इसका निर्माण करवा रहे हैं।

मंदिर के बारे में कहा जाता था कि इसे श्राप है कि ये कभी पूरा नहीं होगा लेकिन ये मंदिर का निर्माण कार्य पूर्णता की ओर है। मंदिर प्रशासन के हिसाब से 1903 से शुरू हुए इस मंदिर का निर्माण कार्य अपने अंतिम स्तर पर चल रहा है।

आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि राधास्वामी मत के संस्थापक और प्रथम गुरु परमपुरुष पूरनधनी स्वामी जी महाराज का जन्म आगरा की पन्नी गली में 25 अगस्त, 1818 को जन्माष्टमी के दिन खत्री परिवार में हुआ था। उनका नाम सेठ शिवदयाल सिंह था। पिता का नाम राय दिलवाली सिंह था। छह साल की उम्र में ही योगाभ्यास शुरू कर दिया था। वे स्वयं को एक कमरे में कई-कई दिन तक बंद कर लेते थे। उन्होंने हिन्दी, फारसी, उर्दू और गुरुमुखी भाषा सीखी। फारसी पर किताब भी लिखी।[1]

मंदिर की सुंदरता जितनी भव्य है मंदिर का इतिहास भी उतना ही रोचक है। मंदिर से जुड़ा हर तथ्य आध्यात्म से जुड़ा हुआ है। मुख्य समाध का निर्माण कार्य पूरा हो चुका है। मेन गेट का कार्य चल रहा है। मंदिर को भव्य एवं आकर्षक बनाने के लिए पत्थरों का चयन बेहद ही ध्यानपूर्वक किया गया है। समाध में शीतलता, सौम्य एवं शांति का वातावरण बनाए रखने के लिए रंगों के चुनाव को भी महत्ता दी गई है।

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क्या आप दुनिया के कुछ गहरे रहस्य बता सकते हैं?

प्रकृति के कई रहस्य आज भी अनसुलझे हैं। वैज्ञानिकों ने कुछ रहस्यों से तो परदा हटा लिया है लेकिन दुनिया की कुछ रहस्यजनक चीजों पर से अभी तक परदा नहीं हटाया जा सका है। कुछ ऐसी ही पहेलियों के बारे में जो आज भी सभी के लिए अबूझ बनी हुई हैं-

1) द डांसिंग प्लेग ऑफ 1518

इसके बारे में पढ़कर ऐसा लगता है जैसे यह कोई कहानी हो. 1518 में गर्मी के दिनों में शहर स्ट्रासबर्ग में एक महिला ने सड़क पर भयानक तरीके से नाचना शुरू कर दिया था. दिन से रात हो जाती और रात से दिन पर उसका नाचना बंद नहीं होता. एक सप्ताह के भीतर ही 34 अन्य महिलाओं ने भी उसके साथ नाचना शुरू कर दिया. उन्हें देखकर ऐसा लगता था जैसे कि उनके अंदर किसी आत्मा का वास हो गया हो. नाचने की ना तो कोई वजह थी और ना ही कोई खास मौका. एक महीने के अंदर नाचने वाली महिलाओं की संख्या 400 पहुंच गई. धार्मिक पुरोहितों और लोगों को स्थिति पर नियंत्रण लाने के लिए बुलाया गया. डॉक्टरों और वैज्ञानिकों को भी बुलाया गया।

कई महिलाओं की हालत खराब होने लगी. यहां तक कि कई महिलाओं की नाचते-नाचते मौत हो गईं. इसके बाद उनके लिए लकड़ी के स्टेज बनाए गए और अलग से हॉल बनाए गए. लोगों का ऐसा मानना था कि डांस कर रही महिलाओं की स्थिति तभी सुधर पाएगी जब वे रात-दिन नाचेंगी. इस घटना के पीछे कई थ्योरी दी गई. जहर, एपिलेप्सी, सामूहिक मानसिक बीमारी कई वजहें बताई गईं और कई तरीके आजमाए गए लेकिन इस ऐतिहासिक घटना का आज तक संतोषजनक जवाब नहीं मिल सका है।

2) द एस एस ओरंग मेडान

जून 1947 में मलक्का की खाड़ी में व्यापारिक मार्ग से कई जहाज गुजर रहे थे. तभी एक एसओेएस संदेश पहुंचा, ‘जहाज के सभी क्रू सदस्यों की मौत हो गई है.’ नजदीक के जहाज सिग्नल का सोर्स पहचानते हुए उसकी तरफ बढ़े. सबसे नजदीक की मर्चेन्ट शिप ‘द सिल्वल स्टार’ सिग्नल की तरफ तेजी से पहुंची. ओरंग मेडान पर आते ही वे हैरान रह गए. क्रू के हर सदस्य की मौत हो चुकी थी. जहाज पर शव इधर-उधर बिखरे पड़े थे. कई लोगों की आंखें अब तक खुली हुई थीं और उनके चेहरे पर डर साफ दिख रहा था. जहाज पर सवार कुत्ते की भी मौत हो गई थी. बॉयलर रूम में शवों के नजदीक जाने पर क्रू सदस्यों को बहुत ठंड लगने लगी जबकि तापमान 110 डिग्री फॉरेनहाइट था.

आश्यचर्यजनक बात यह रही कि किसी भी शरीर पर चोट के कोई निशान नहीं थे. ‘द सिल्वर स्टार’ के क्रू सदस्यों ने वापस अपनी शिप पर जाने का फैसला किया. इससे पहले ही डेक के नीचे से धुआं निकलने लगा. एस एस ओरंग मेडान में विस्फोट होने से कुछ सेकेंड पहले ही वे किसी तरह अपनी शिप पर वापस पहुंच पाए. कुछ लोगों ने इस दुर्घटना के पीछे प्राकृतिक गैसों के बादल बनने का हवाला दिया. वहीं अधिकतर लोग इसके पीछे सुपरनैचुरल पावर को जिम्मेदार ठहराते हैं।

3) नाजका लाइन्स, नाजका रेगिस्तान, दक्षिणी पेरू

पेरू में मौजूद इस रेगिस्तानी सतह पर ऐसी आकृतियां बनी हुईं है, जो आपको चौंका सकती हैं. इनमें से कुछ इंसानों, पौधों और जानवरों की मालूम पड़ती हैं. इसके अलावा वहां सतह पर सीधी रेखाएं भी दिखलाई पड़ती हैं. माना जाता है कि ये रेखाएं 200 ईसा पूर्व से इसी तरह मौजूद हैं. ये लाइनें करीब 500 वर्ग किलोमीटर में फैली हैं. हेलीकॉप्टर की मदद से इन्हें और साफ‍-साफ देखा जा सकता है. इसके बारे में ऐसा भी कहा जाता है कि यहां दूसरे ग्रह से आईं UFO उतरे थे, जिसके चलते सतह पर इतनी संरचनाएं बनी थीं।

4) मिनेसोटा डेविल्स वॉटरफॉल

इस झरने को रहस्यमयी माना जाता है. इस झरने में दो धाराएं ऊपर से गिरती है. एक धारा तो सामान्य धाराओं की तरह बहती है पर दूसरी रहस्यमयी धारा एक छेद में गिरकर कहां गायब हो जाती है, यह गुत्थी आज तक नहीं सुलझ पाई है. हैरानी की बात यह है कि ‘द डेविल्स कैटल’ नाम के छेद में आधी नदी का पानी समा जाता है।

5) इजिप्ट के मंदिर में छिपाकर रखे गए जूते

पुरातत्वेत्ताओं को 2004 में खुदाई के दौरान एक अजीब चीज मिली. एक जार में उन्हें 7 जोड़ी जूते मिले. ये जूते बहुत ही अच्छी अवस्था में थे. दो जोड़ी जूते बच्चों के थे जबकि बाकी वयस्कों के. ऐसा कहा जाता है कि यह जार 2000 साल पहले जानबूझकर छिपा कर रखा गया था।

6) खिसकते हुए पत्थर, डेथ वैली, कैलिफोर्निया

डेथ वैली के नाम से कुख्यात इस जगह पर सैकड़ों पत्थर मौजूद हैं. इस सूखे मरुस्थल पर अलग-अलग वजन के ये पत्थर बड़े रहस्यमयी ढंग से मौजूद हैं. कुछ पत्थर ऐसे लगते हैं जैसे वे घिसटते हुए आगे बढ़ रहे हैं. उनके पीछे लंबी लकीर मौजूद है. यहां मौजूद नजारा कुछ ऐसा है कि आप देखकर हैरान हो जाएंगे. किसी इंसान या जानवर के जरिए इन पत्थरों को घसीटने के सबूत नजर नहीं आते क्योंकि वहां मौजूद मिट्टी बिना छेड़छाड़ दिखाई देती है. कुछ लोगों का ऐसा मानना है कि भौगोलिक बदलाव या तूफान के चलते पत्थर कुछ इस तरह मौजूद हैं।

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क्या आप कुछ हैरान करने वाले तथ्य साझा कर सकते हैं?

यह जगह को इतना रहस्य रखा गया है कि नासा भी इसका हिस्सा नही है ।इस जगह को एलियंस का गढ़ मन जाता है। कई ऐसे सबूत मिले है जो यह बताता है कि एलियंस (और उनकी तकनीक) मौजूद हैं और इसकी दीवारों के पीछे छिपे हुए हैं। हालांकि इसका एकमात्र पुष्टि करण उड़ान परीक्षण सुविधा के रूप में है।

विमान का भी वहा जाना मन है। यहां तक ​​कि उपग्रह भी लाइव तस्वीरें क्लिक नहीं कर सकता है।अगर कोई इंसान वहाँ आस पास भी नजर आता है तो उसे गोली मार देने का आदेश है इसका खुलासा वहाँ के एक सिक्योरिटी गार्ड ने किया था जिसका नाम फ्रेड दुन्हुम था। इतना ही नहीं वहाँ मैग्नेटिक सेंसर व् लगा है जो कई किलोमीटर पहले ही हवाई एवं सड़क वाहनों को रोक देते है। लेकिन एक बात हमेशा उठती रही है की अगर वहाँ उड़ान परीक्षण होता है तो इतनी प्रतिबंध क्यों है। आम नागरिकों को वहाँ जाने से क्यों रोका जाता है ।

एरिया 51 में काम कर चुके एक ऐसे ही शख्सि है जिनका नाम बॉब लेज़र है जो की एक स्पेस साइंटिस्ट है ।उनके अनुसार, उन्होंने एक एलियन के यूएफओ पर शोध किया था, जो की बिना किसी भी ऊर्जा स्रोत के ही उड़ान भर सकता था। उन्होंने पाया कि एलियंस एक विशेष धातु का उपयोग कर रहे थे जिसका परमाणु सं। 115 थी. यह एक ऐसी धातु है जो एंटी-ग्रैविटी फेनोमेनन पर काम करती है।इस तत्व को बहुत बाद में खोजा गया और इसे मोस्कोवियम नाम दिया गया ,लेकिन आपको यह जान के ताज्जुब होगा कि बॉब लेज़र ने कई वर्ष पहले 1989 में ही इसका खुलासा कर दिया था और तत्व को 2013 में खोजा गया। उनके अनुसार, एलियंस किसी के दिमाग को पढ़ सकते हैं ,उन्होंने यह भी बताया की वे 9 एलियंस के साथ भी काम कर चुके है, तब सभी ने उसकी बातों पर विश्वास करने से इनकार कर दिया

सोर्स गूगल

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रोल्स रॉयस कार कंपनी ने अभिनेत्री मल्लिका शेरावत को कार देने से मना क्यों कर दिया था? रॉयस वो कार है, जिसे खरीदने का सपना हर कार लवर देखता होगा, लेकिन हर किसी का ये सपना सच नहीं हो पाता है।

भले ही आपके पास रोल्स रॉयस खरीदने के लायक या उससे कई गुना ज्यादा पैसे क्यों न हों, लेकिन रोल्स रॉयस को आप भी खरीद नहीं सकते हैं।

बताया जाता है कि रोल्स रॉयस खरीदने के लिए आपके पास सिर्फ इसकी कीमत जितने पैसे होने ही जरूरी नहीं हैं बल्कि इसके साथ समाज में नाम और रुतबा होना भी बहुत ज्यादा जरूरी है।इसके अलावा एक ठीक-ठाक व्यापारी, कलाकार, खिलाड़ी या किसी क्षेत्र में खास नाम होना जरूरी है।

कंपनी ये नहीं देखती है कि आज आपके पास कितना पैसा है बल्कि ये भी देखती है कि पहले आप कैसे थे, आपका रहन-सहन कैसा था। पहले आपका परिवार कैसा रहा है और आप आज अमीर बने हैं या पुराने अमीर खानदान से हैं।

मल्लिका शेरावत को मना करने की वजह..रॉल्स रॉयस कंपनी का तर्क था कि मल्लिका की हैसियत तो है पर शख्सियत नहीं यह कार खरीदने की। माना कि उन्होंने अपने शरीर के उभार के कारण कई बॉलीवुड और हॉलीवुड फिल्मों में काम करके अपनी पहचान बनाई है, लेकिन शायद ‘रॉल्स रॉयस’ के लिए इतना काफी नहीं है। ‘रॉल्स रॉयस’ का मालिक बनने के लिए कंपनी व्यक्ति के सोशल स्टेटस, बैकग्राउंड और प्रोफाइल पर भी खास ध्यान देती है और शायद उनकी नज़र में मल्लिका शेरावत का वो स्टेटस नहीं था। इसके बाद मल्लिका शेरावत ने ट्वीट किया था कि ‘यह सच नहीं है, कृपया इस तरह की अफवाहों पर ध्यान न दें।

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गाँधीजी को मारने वाले नातूराम गोडसे की अस्थियां आजतक सुरक्षित क्यों रखी गई है?

30 जनवरी 1948 देश के राष्ट्र पिता कहे जाने वाले महात्मा गांधी की हत्या हुई थी। ओर हत्यारे का नाम नथूराम गोडसे। नाथूराम गोडसे ने अपनी पिस्टल निकली और एक के बाद एक करके तीन गोलियां गाँधीजी के शरीर मे उतार दी थी।

इस घटना के बाद पूरे देश मे शोक का माहौल बन गया था। हालांकि पूरे देश को इस घटना के बारे में पता नही था। जिसे बाद में देश के प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू द्वारा उजागर किया गया, की महात्मा ग़ांधी अब हमारे बीच मे नही रहे।

इधर पूरा देश मायूसी मे था और उधर नथूराम गोडसे को गिरफ्तार कर लिया गया था। उसपर एक साल से अधिक समय तक मुकदमा चला और इसी बीच उन्होंने अपना जुर्म भी काबुल कर लिया था। की क्यों उसने गाँधीजी की हत्या की।

अपना पक्ष रखते हुए गोडसे ने कहा “गाँधीजी ने जो देश की सेवा की है में उसका में आदर करता हु इसलिए उनपर गोली चलाने से पहले में उनके आदर में झुका भी था,लेकिन उन्होंने अखंड भारत को दो टुकड़ों में बंटा इसलिए मैंने उन्हें गोली मारी”।

आखिर कार 8 नवंबर 1949 को अदालत ने गोडसे को मृत्युदंड की सजा सुनाई। 15 नवंबर 1949 को अम्बाला जेल में गोडसे को फाँसी दे दी गयी।

फांसी से पहले गोडसे के एक हाथ मे गीता और अखंड भारत का नक्शा था। ओर दूसरे हाथ मे भगवे रंग का झंडा था।

कहा जाता है फांसी का फंदा गले मे पहनने से पहले गोडसे ने ‘नमस्ते सदा वत्सले ‘ का भी उच्चारण किया था। ओर साथ मे नारे भी लगाए थे।

सायद आप जानते न हो मगर नथूराम गोडसे की अस्थियां को आज तक नदी में प्रवाहित नही की गई है। वो पुणे में शिवाजी नगर में स्थित एक इमारत की कमरे में सुरक्षित रूप से रखी गयी है।

उस कमरे में अस्थि कलश के साथ उसके कुछ कपड़े और उसके हाथ से लिखे नोट्स भी रखे गए है। नथूराम के भतीजी हिमानी सावरकर के बयान के अनुसार, नथूराम गोडसे ने अपनी परिवार से अपनी अंतिम इच्छा को जाहिर करते हुए कहा था,उसकी अस्थियों को तब तक संभाल कर रखा जाए जब तक सिंधु नदी स्वतंत्र भारत मे समाहित न हो जाय और अखंड भारत स्थापित न हो जाय।

ये सपना पूरा हो जाने के बाद मेरी अस्थियों को सिंधु नदी में प्रवाहित की जाय।

इसलिए गोडसे के परिवार वालो ने उसकी अस्थियो को संभाल कर रखे हुए है। और उनके सपने पूरे होने का इन्तेजार कर रहे है।

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मृत्यु के समय रावण की उम्र कितनी थी और रावण का गोत्र कौन सा था?

इसको समझने के लिए हमें अपना दिमाग थोड़ा खोलना होगा क्योंकि समय की जिस गणना की बात हम कर रहे हैं उसे आज का विज्ञान नही समझ सकता। पहली बात तो ये कि जब कोई कहता है कि रामायण 14000 वर्ष पहले की कथा है तो ये याद रखिये कि ये वैज्ञानिकों ने आधुनिक गणना के अनुसार माना है। अगर वैदिक गणना की बात करें तो रामायण का काल खंड बहुत पहले का है। आइये इसे समझते हैं।

पहले तो इस बात को जान लीजिए कि रावण की वास्तविक आयु के बारे में किसी ग्रंथ में कोई वर्णन नही दिया गया है। मैंने कोरा पर कई उत्तर देखे कि रावण तो 20 लाख वर्ष का था, किसी ने कहा वो 80 लाख वर्ष का था या कुछ और। एक बात समझ लें कि अगर कोई रावण की वास्तविक आयु बता रहा है तो वो झूठ बोल रहा है। रामायण में ना रावण की आयु और ना ही श्रीराम की आयु के बारे में कुछ कहा गया है। लेकिन इन दोनों के शासनकाल के विषय मे जानकारी दी गयी है जिससे हम इनकी आयु का केवल अंदाजा लगा सकते हैं।

पर इससे पहले कि हम उनकी आयु के विषय मे जाने, बस सरसरी तौर पर पौराणिक काल गणना समझ लेते हैं क्योंकि विस्तार से तो इस लेख में बताना संभव नही। त्रेतायुग 3600 दिव्य वर्षों का था। एक दिव्य वर्ष 360 मानव वर्षो के बराबर होता है। इस हिसाब से त्रेतायुग का कुल काल हमारे समय के हिसाब से 3600 × 360 = 1296000 (बारह लाख छियानवे हजार) मानव वर्षों का था। इस गणना को याद रखियेगा ताकि आगे की बात समझ सकें।

रावण त्रेतायुग के अंतिम चरण के मध्य में पैदा हुआ था और श्रीराम अंतिम चरण के अंत मे। त्रेता युग मे कुल तीन चरण थे। रामायण में ये वर्णन है कि रावण ने अपने भाइयों (कुम्भकर्ण एवं विभीषण) के साथ 11000 वर्षों तक ब्रह्माजी की तपस्या की थी। इसके पश्चात रावण और कुबेर का संघर्ष भी बहुत काल तक चला। इसके अतिरिक्त रावण के शासनकाल के विषय मे कहा गया है कि रावण ने कुल 72 चौकड़ी तक लंका पर शासन किया। एक चौकड़ी में कुल 400 वर्ष होते हैं। तो इस हिसाब से रावण ने कुल 72 × 400 = 28800 वर्षों तक लंका पर शासन किया।

इसके अतिरिक्त रामायण में ये वर्णित है कि जब रावण महादेव से उलझा और महादेव ने उसके हाथ कैलाश के नीचे दबा दिए तब रावण 1000 वर्षों तक उनसे क्षमा याचना (उनकी तपस्या) करता रहा और उसी समय उसने शिवस्त्रोत्रतांडव की रचना की। हालांकि ऐसा उसके लंका शासनकाल में ही हुआ इसीलिए इसे मैं अलग से नही जोड़ रहा।

तो रावण के शासनकाल और तपस्या के वर्ष मिला दें तो 11000 + 28800 = 39800 वर्ष तो कहीं नही गए। तो इस आधार पर हम ये कह सकते हैं कि रावण की आयु कम से कम 40000 वर्ष तो थी ही (उससे भी थोडी अधिक हो सकती है)। अर्थात वो करीब 112 दिव्य वर्षों तक जीवित रहा।

श्रीराम और माता सीता के विषय मे वाल्मीकि रामायण मे कहा गया है कि देवी सीता श्रीराम से 7 वर्ष 1 माह छोटी थी। श्रीराम विवाह के समय 25 वर्षों के थे तो इस हिसाब से माता सीता की आयु उस समय 18 वर्षों की थी। विवाह के पश्चात 12 वर्षों तक वे दोनों अयोध्या में रहे उसके बाद उन्हें वनवास प्राप्त हुआ। इस हिसाब से वनवास के समय श्रीराम 37 और माता सीता 30 वर्ष की थी। तत्पश्चात 14 वर्षों तक वे वन में रहे और वनवास के अंतिम मास में श्रीराम ने रावण का वध किया। अर्थात 51 वर्ष की आयु में श्रीराम ने 40000 वर्ष के रावण का वध किया। तत्पश्चात श्रीराम ने 11000 वर्षों तक अयोध्या पर राज्य किया। तो उनकी आयु भी हम तकरीबन 11100 वर्ष (30 दिव्य वर्ष) के आस पास मान सकते हैं।

रावण का गोत्र उनके पितामह का गोत्र ही था अर्थात पुलत्स्य गोत्र।

इस गणना के हिसाब से रावण के अतिरिक्त कुम्भकर्ण, मेघनाद, मंदोदरी इत्यादि की आयु भी बहुत होगी। विभीषण तो चिरंजीवी हैं तो आज भी जीवित होंगे। जाम्बवन्त तो सतयुग के व्यक्ति थे जो द्वापर के अंत तक जीवित रहे, तो उनकी आयु का केवल अनुमान ही लगा सकते हैं। महावीर हनुमान रावण से आयु में छोटे और श्रीराम से आयु में बहुत बड़े थे। वे भी चिरंजीवी हैं तो आज भी जीवित होंगे। परशुराम रावण से आयु में थोड़े छोटे और हनुमान से बड़े थे और वे भी चिरंजीवी हैं। कर्त्यवीर्य अर्जुन आयु में रावण से भी बड़े थे किंतु परशुराम ने अपनी युवावस्था में ही उनका वध कर दिया था।

कुछ लोग ये सोच रहे होंगे कि किसी व्यक्ति की आयु इतनी अधिक कैसे हो सकती है। किंतु हमारे पुराणों में चारो युग के मनुष्यों की औसत आयु और कद का वर्णन है। और ये सभी मनुष्यों के लिए है, ना कि केवल रावण और श्रीराम जैसे विशिष्ट लोगों के लिए। हालांकि रावण जैसे तपस्वी और श्रीराम जैसे अवतारी पुरुष की आयु वर्णित आयु से अधिक होने का विवरण है।

जैसे जैसे युग अपने अंतिम चरम में पहुंचता है, वैसे वैसे ही मनुष्यों की आयु और ऊंचाई घटती जाती है। अर्थात सतयुग के अंतिम चरण में जन्में लोगों की आयु और ऊंचाई सतयुग के ही प्रथम चरण में जन्में लोगों से कम होगी। आइये इसपर भी एक दृष्टि डाल लेते हैं:

  1. सतयुग: आयु – 100000 वर्ष, ऊंचाई – 21 हाथ
  2. त्रेतायुग: आयु – 10000 वर्ष, ऊंचाई – 14 हाथ
  3. द्वापरयुग: आयु – 1000 वर्ष, ऊंचाई – 7 हाथ
  4. कलियुग: आयु – 100 वर्ष, ऊंचाई – 4 हाथ

महाभारत में वर्णित है कि रेवती के पिता कुकुद्भि, जो सतयुग से थे, ब्रह्माजी के आदेश पर अपनी पुत्री का विवाह करवाने द्वापर आये। उन्होंने रेवती का विवाह बलराम से कर दिया किन्तु सतयुग की होने के कारण रेवती बलराम से 3–4 गुणा अधिक ऊंची थी। तब बलराम ने अपने हल के दवाब से रेवती की ऊंचाई स्वयं जितनी कर ली।

मैंने, जितना हो सकता था, इस उत्तर को सारगर्भित बनाने का प्रयास किया है। आशा है आपको पसंद आएगा। जय श्रीराम। 🚩

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आपने अपने पड़ोसी को कौनसी सबसे शर्मनाक हरकत करते देखा है?

मेरे पड़ोस में एक अंकल उनकी बेटी, बेटे और पत्नी के साथ रहते हैं, अंकल बहुत प्रतिष्ठित व्यक्ति हैं, और वो काफी समय से मेरे पड़ोस में रहते हैं, उनकी बेटी मुझसे 4 5 साल छोटी है, जो थोड़ा गलत रास्ते पर निकल गई थी,

बात करीब 4 5 साल पुरानी है, उनके घर मे बहुत तेज़ लड़ने की आवाज़ आ रही थी, और समान पटकने की आवाज़ आ रही थी।

मेरे ससुरजी और कॉलोनी के 3 4 लोग उनके यहां पहुंचे तो, अंकल और उनका बेटा बाहर आये और बोले लड़की हाथ से निकल गई, और दिन भर रात भर किसी से धीरे धीरे बात करती रहती है, और आज ये कॉलेज का बोल के गई थी और मेरे बेटे को किसी लड़के के साथ एक पार्क में बैठी मिली।

तो हम लोग उसे समझा रहे हैं कि दुनिया बहुत खराब होती है, तो वो उल्टा हम पर चिल्लाचोट कर रही है।।

उतने में उनकी लड़की भी बाहर आ गई, और अंकल को बोली चुप पर कुत्ते, बहुत बकवास सुन ली तेरी।।

ये सुन कर उनके बेटे ने लड़की को चांटा मार दिया।

तब तो वो लड़की अंदर चली गई, और सब पड़ोसी चुपचाप अपने घर आ गए।।

फिर करीब 12 बजे पुलिस उनके घर आई जो कि उनकी बेटी ने डायल 100 पर फ़ोन करके बुलाई थी, को बेटी ने शिकायत करी कि मेरे पापा मम्मी मुझे मारते हैं और भाई उसके साथ गलत काम करता है।।

ये सुन कर पुलिस तीनों को मां पिता और छोटे भाई को अपने साथ ले गई।।

इससे शर्मनाक घटना मैंने अपने जीवन मे कभी नहीं देखी और सिर्फ इतनी सी बात समझाने पर कि बेटा दुनिया बहुत खराब होती है, पर उस लड़की ने उल्टा अपने ही पिता और भाई को फंसा दिया।

हालांकि बाद में उस लड़की के आरोप साबित नहीं हो पाए और पिता भाई माँ तीनो को छोड़ दिया गया और बेटी को गलत आरोप लगाने के कारण पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया।।

पर कुछ बेटियां भी अपने माता पिता को कलंकित करने में 1 पल भी नहीं सोचतीं।।

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इतिहास में क्रूरता के उदहारण क्या हैं? ब्रेजन बुल की यातना

यह प्राचीन ग्रीस में अपराधियों के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एक मृत्यु उपकरण था, और इसे देखकर ही रूह कांप जाती थी.

बैल की एक खोखली कांसे की प्रतिमा का रास्ता उसके मुह से खुलता था.

अपराधी को नग्न या कम से कम कपड़ों के साथ खोखले मूर्ति में फेंक दिया जाता था, दरवाजा बंद हो जाता और उन पर ताला लगा दिया जाता था। फिर, वे प्रतिमा के नीचे एक अग्नि प्रज्ज्वलित करते थे, जो पीड़ित को जीवित रूप में पकाता था। पीड़ित की चीखें नलियों की एक श्रृंखला से गुज़रती थी, जो बैल की नथुनी से निकलती और जो आवाज़ निकलती थी, वह बैल की चीख की तरह होती थी। कथित तौर पर, बैल के नाक से उत्पन्न धुआं अगरबत्ती की तरह इस्तेमाल किया जाता था।

इसका पहला शिकार भी कुछ दिलचस्प है, क्योंकि यह वास्तव में वह व्यक्ति था जिसने इसे बनाया था। असल में, इसे बनाने वाला आदमी पेरिलोस अपने राजा के पास गया और बताया कि यह चीज़ कैसे काम करती है।

राजा उसे प्रदर्शित करना चाहता था, इसलिए पेरिलोस उसके अंदर चढ़ गया। दरवाजा बंद हो गया और वह अंदर बंद था। राजा इसे अपने पूर्ण प्रभाव में देखना चाहता था, इसलिए उसने वास्तव में इसके नीचे आग लगा दी, और चीखें सुनी। इस तरह से इस क्रूर मौत का अविष्कारक हीं इसका पहला शिकार बना।

यह इतिहास में सबसे क्रूर और विडंबनापूर्ण मौत है।